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Covid-19: महामारी से पैदा अवसाद युवाओं को बना रहा भावुक,युवाओं में बढ़ी रोने की आदत

कोरोना वायरस के कारण पैदा हो रहे अवसाद से युवाओं को भावुक बना दिया है। 35 साल से कम उम्र के युवा नकारात्मक भावों से घिरा महसूस करने लगे हैं, उनमें रोने और घबराहट की प्रवृत्ति भी बढ़ गई है। शिकागो विश्वविद्यालय ने एक अध्ययन के जरिए इस बात का पता लगाया।

शोध के अनुसार, 18 से 34 साल के 56 प्रतिशत युवाओं ने बीते चार महीनों के दौरान खुद को अलग-थलग महसूस किया। जबकि ऐसा महसूस करने वाले अधेड़ व बुजुर्गों का प्रतिशत कम है 67% युवा जिंदगी की अहम चीजों को संभालने में खुद को नाकाम पा रहे, 55% उम्रदराज ऐसा महसूस कर रहे।  ठीक इसी तरह 55% युवाओं ने माना कि उन्हें अपनी भावनाओं पर काबू पाने में मुश्किल हो रही, 33% उम्रदराज लोगों को ही इस चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। यह सर्वे 22 जुलाई से दस अगस्त के बीच 2007 वयस्कों पर किया गया।

सिर में दर्द से परेशान –
भावनात्मक रूप से युवाओं के कमजोर हो जाने का असर उनके शरीर पर पड़ने लगा है। युवा सिर दर्द और छोटी-छोटी बातों पर भावुक हो जाने से परेशान हैं इस कारण उन्हें अनिद्रा से भी जूझना पड़ रहा है।

सोशल मीडिया का असर –
35 साल से कम उम्र के वयस्क सबसे ज्यादा समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं जहां वायरस से जुड़ी नकारात्मक खबरों से वे खुद को नहीं बचा पाते। साथ ही हमउम्र लोगों के महामारी से जुड़े अनुभव भी उनमें तनाव बढ़ा रहे हैं।
चुनौतियों से लड़ने में अनुभव की कमी का असर-
शोधकर्ता ने लिखा है कि युवावस्था जीवन की सबसे ज्यादा बदलाव देखने वाली उम्र होती है, कोई परीक्षा की तैयारी में होता है तो कोई व्यापार करने या विवाह करके परिवार बसाने की योजना में। महामारी ने इन योजनाओं को झटका दिया है, जिस तनाव को युवा नहीं झेल पा रहे। वहीं, अधेड़ या उम्रदराज लोग पहले भी तमाम तरह की आर्थिक, सामाजिक व पारिवारिक समस्याओं से जूझे होते हैं इसलिए वे महामारी से पैदा हुई परेशानियों से जूझने के लिए खुद को ज्यादा तैयार पा रहे हैं। यही कारण है कि शोध में पाया कि उम्र बढ़ने के साथ लोगों में तनाव से 56% युवा वयस्कों ने खुद को तालाबंदी के बाद से अलग-थलग महसूस किया। 10 में से 4 उम्रदराज लोगों ने ही खुद को महामारीकाल में आइसोलेट पाया। 25% युवा व 13% उम्रदराज लोगों ने माना कि उनका मानसिक स्वास्थ्य खराब है

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