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फ्रांस में सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ, मौजूदा हुकूमत यथावत रही। धुर दक्षिण पंथी नेत्री मेरी ली पेन को उम्मीद थी कि इस बार जनता बदलाव करेगी और चुनाव में उनका ही परचम लहराएगा। वैसा हुआ नहीं, जनता ने फिर से पुराने राष्ट्रपति में ही भरोसा जताया और इमैनुअल मैक्रों को प्रचंड बहुमत देकर वापसी करवा दी। अपने प्रतिद्वंद्वी को ठीक-ठाक मतों से मात देकर ला रिपब्लिक एन मार्श पार्टी के नेता व राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों दोबारा फ्रांस की सत्ता पर काबिज हुए। उम्मीदों और चुनौतियों के बीच वह दोबारा देश की बागडोर संभालेंगे। उन्हें रिकॉर्ड 60 फीसदी के आसपास वोट मिले। हालांकि विरोधी पार्टी ने अच्छी टक्कर दी और पहले राउंड में विपक्षी दल की बढ़त रही थी।

राष्ट्रपति मैक्रों के दोबारा सत्ता में वापसी के कुछ कारण और भी हैं। कुछ ऐसी ऐतिहासिक परियोजनाएं ऐसी हैं जिन्हें जनता उन्हीं से करवाना चाहती हैं। बीते पांच वर्षों में भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देशों के साथ सामरिक, व्यापारिक व सियासी संबंध अच्छे बने हैं। विदेश नीतियों में पिछली सरकारों के मुकाबले अच्छा काम हुआ। भारत जैसे देशों से आयात-निर्यात, आपसी संबंधों की साझेदारी में और गहराई आई। इन्हीं योजनाओं को संबल देने के लिए जनता ने मैक्रों पर ही भरोसा करना समझदारी समझी।

इमैनुअल मैक्रों के फ्रांस में लगातार दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने पर भारत भी खुश है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मैक्रों को अपना अच्छा मित्र बताते हुए गर्मजोशी के साथ उन्हें बधाई दी और उम्मीद जताई कि उनकी जीत भारत-फ्रांस के मध्य सामरिक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करेगी और तेजगति से आगे बढ़ाएगी, साथ ही भविष्य में साथ मिलकर काम करने उम्मीद भी जतायी।

गौरतलब है कि मौजूदा वक्त में दोनों देशों के बीच संबंध मधुर हैं। चाहे राजनीतिक कूटनीतिक हों, या मौसम, जलवायु परिवर्तन से संबंधित हों। ग्लोबल वार्मिंग को लेकर दोनों देशों के बीच एग्रीमेंट भी है। इसके अलावा और कई ग्लोबल स्तर के समझौते हैं जिन्हें नई सरकार के जरिए संबल मिलेगा। हरित क्षेत्र को लेकर भी दोनों देशों के बीच करार है। मैक्रों युवा नेता हैं और पहले ऐसे सर्वमान्य व लोकप्रिय हैं, जिन पर फ्रांस की जनता को ढेरों उम्मीदें हैं। वह पहले ऐसे राष्ट्रपति भी हैं जो दोबारा सत्ता में आए हैं, वह भी प्रचंड़ बहुमत के साथ। इसलिए उम्मीदों का पहाड़ उनके कंधों पर है। मैक्रों के पिछले कार्यकाल में कई ऐसी उपलब्धियां रहीं जिनके बूते वह दोबारा सत्ता में आए।

कायदे से देखें तो मैक्रों का दोबारा राष्ट्रपति बनना यूरोप के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। जिस तरह से रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई है, उस लिहाज से मैक्रों जैसे नेताओं का पावरफुल होना जरूरी हो जाता है। बीते पांच वर्षों में फ्रांस के राष्ट्रपति के रूप में इमैनुएल मैक्रों की पहचान प्रमुख वैश्विक नेता के तौर पर उभरी है। उनकी निष्पक्षता, साफगोई से बात कहना, उनके फैसले काबिल-ए-तारीफ रहे हैं। देश की अवाम के अलावा अपनी पार्टी ला रिपब्लिक एन मार्श में भी उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। पार्टी के प्रमुख नेता उनके कार्यपद्धति से खुश हैं। वहीं, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी एकाध मंचों पर उनकी दूरगामी सोच की तारीफ कर चुके हैं और भी कई ऐसे विदेशी नेता हैं, जिनके मुंह से फ्रांस के राष्ट्रपति के लिए तारीफ निकली हैं। इस लिहाज से उनका दोबारा फ्रांस का राष्ट्रपति बनना ना सिर्फ हिंदुस्तान के लिए अच्छा है, बल्कि यूरोप सहित विश्व बिरादरी के भी हितकर है।

फ्रांस के मौजूदा चुनाव में बहुत कुछ ऐसा हुआ जो अमूमन हमारे यहां देखने को मिलता है। जैसे, चुनावी समर में नेताओं की दलबदल या एक पार्टी से छिटक कर दूसरे दल का हाथ थाम लेना। फ्रांस में भी कमोबेश ऐसा ही हुआ। एक कद्दावर वामपंथी नेता ज्यां लुक मेलेन्श जो चुनाव के ऐन वक्त अपनी पार्टी और सहयोगी नेता मेरी ली पेन से बगावत कर विजयी गुट में शामिल हो गए थे। फ्रांस के चुनावी विशेषज्ञ इस बात को मान भी रहे हैं कि मैक्रों की जीत में ज्यां लुक मेलेन्श और उनके समर्थकों की बड़ी भूमिका रही है। जबकि, मैक्रों से नाराज कामकाजी वर्ग के मतदाताओं का पूरा ध्रुवीकरण ली पेन के पक्ष में हुआ।

इस चुनाव की एक और महत्वपूर्ण बात। पराजित हुई मेरी ली पेन के हारने के पीछे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ उनका बोलना भी रहा। चुनाव से कुछ माह पूर्व उन्होंने मुसलमानों के टोपी पहनने पर सार्वजनिक रूप से प्रतिबंध की मांग उठाई थी। उनकी इस मांग के बाद उनकी लोकप्रियता में इजाफा तो हुआ लेकिन यह वोट में तब्दील नहीं हुआ। एक वक्त ऐसा आया, जब उनकी गिनती राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से बढ़कर होने लगी थी, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आया, उनकी हैसियत धरातल पर आती गई। जबकि उनकी पार्टी को फ्रांस में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा प्राप्त है। उनके पिता धुर दक्षिणपंथी रहे थे, उन्होंने ही पार्टी की कमान उनको सौंपी थी।

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