Home / धर्म / वीरवार व्रत/ गुरुवार व्रत/ बृहस्पतिवार व्रत की पूजा विधि और नियम

वीरवार व्रत/ गुरुवार व्रत/ बृहस्पतिवार व्रत की पूजा विधि और नियम

भगवान विष्णु सृष्टि का रक्षक कहा गया है. उन्हें बृहस्पति देव भी माना जाता है, इसलिए बृहस्पतिवार (वीरवार) का दिन विष्णु जी को समर्पित होता है. भगवान शिव ब्रह्मा जी और विष्णु जी को मिलकर त्रिदेव कहा जाता है. जो सभी सृष्टि के रचयिता, पालन करने वाले और रक्षक हैं. भगवान विष्णु की पूजा अर्चना से घर में सुख शांति बनी रहती है. भगवान् विष्णु ने कई बार जगत कल्याण के लिए धरती पर अवतार लिए हैं. जब-जब मानवता पर संकट आया है, भगवान विष्णु ने अपने अवतार के रूप में लोगों की रक्षा की है. भगवान विष्णु को नारायण और जगदीश हरि के नाम से भी जाना जाता है. लोग अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखते हैं, किंतु यह व्रत कुंवारी कन्याओं में बहुत प्रचलित है. यह व्रत पौष मास (दिसंबर और जनवरी) को छोड़कर शुक्ल माह में किसी भी गुरुवार से शुरू किया जा सकता है. माना जाता है कि 16 गुरुवार व्रत करने से कुंवारी कन्याओं को मनभावन वर मिलता है और उनके विवाह में आने वाली सभी समस्याएं दूर होती हैं. कोई भी व्यक्ति यदि विधि विधान से भगवान विष्णु का व्रत करता है, तो उसको फल अवश्य मिलता है. आइए जानते हैं किस प्रकार से वीरवार का व्रत किया जाता है.

वीरवार/ गुरुवार व्रत की पूजा विधि और नियम

व्रत की सामग्री: चने की दाल, हल्दी से पीले किए हुए चावल , गुड, केले, पीले पुष्प, कच्चा दूध और जल

वीरवार के दिन व्रत करने वाले को सुबह स्नान करके पीले वस्त्र पहनने चाहिए. उसके बाद व्रत की सारी सामग्री लेकर विष्णु मंदिर जाना चाहिए. वीरवार के व्रत में केले के पेड़ की पूजा का बहुत महत्व है, इसलिए आप मंदिर जाएं और मंदिर में भगवान विष्णु की विधिवत पूजन करने के बाद (पूजन के लिए पीले फूल, चने की दाल, पीली मिठाई, पीले चावल, और हल्दी का प्रयोग करें) केले के पेड़ की पूजा करें. केले के पेड़ की जड़ में दूध और जल अर्पित करें उससे पहले आप दूध और जल के कलश में चने की दाल, गुड और हल्दी लगे हुए पीले चावल डालकर उसी से जड़ का अभिषेक करें. पूजा के समय आप पीले पुष्प चढ़ाएं, हल्दी से तिलक लगाएं और भगवान विष्णु के व्रत की कथा का पाठ करें. यह कथा आप केले के पेड़ के पास ही बैठकर पढ़ व सुन भी सकते हैं. कथा सुनने के बाद आप विष्णु भगवान जी की आरती करें और उन्हें लड्डू अथवा पीले रंग की मिठाई से भोग लगाएं. इसके बाद घी का दीपक जलाकर उस पेड़ की आरती करें. पूजा के समय ॐ गुं गुरुवे नमः मन्त्र का जाप करें.

भगवान विष्णु की पूजा से लक्ष्मी माता भी प्रसन्न रहती है.वीरवार के व्रत के दौरान पुरे दिन उपवास रखा जाता है. दिन में एक बार शाम को भोजन किया जा सकता है. भोजन में पीली वस्तुएं खाएं तो बेहतर होगा लेकिन गलती से भी नमक का इस्तेमाल ना करें. प्रसाद के रूप में केला को अत्यंत शुभ माना जाता है. लेकिन व्रत रखने वाले को इस दिन केला नहीं खाना चाहिए. केला को दान में दे दें.

वीरवार व्रत की कथा:

यह कथा दानवीर राजा की है. वह हर बृहस्पतिवार को व्रत रखता था और गरीबों को दान देता था. लेकिन राजा की रानी को यह बात पसंद नहीं थी. वह न तो व्रत करती थी और ना ही दान करने देती थी.एक दिन राजा शिकार करने जंगल निकला. रानी अपनी दासी के साथ घर पर ही थीं. उसी समय गुरु बृहस्पतिदेव साधु का रूप धारण कर राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने आए. लेकिन रानी ने साधु को भिक्षा देने की बजाय टालती रही. साधु ने दोबारा भिक्षा मांगी. रानी ने फिर काम बताकर कहा कि कुछ देर बाद आना. साधु ने कुछ देर बाद फिर भिक्षा मांगी. इस पर रानी नाराज हो गई और कहा कि मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं. आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मुझे इस कष्ट से मुक्ति मिल जाए.

बृहस्पतिदेव ने कहा कि अगर तुम ऐसा ही चाहती हो तो मैं जैसा तुम्हें बताता हूं तुम वैसा ही करना. गुरुवार के दिन तुम घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिट्टी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, राजा से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस मदिरा खाना, कपड़ा धोबी के यहां धुलने डालना. इस प्रकार सात बृहस्पतिवार करने से तुम्हारा समस्त धन नष्ट हो जाएगा. इतना कहकर साधु रुपी बृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए.साधु ने जैसा बताया, रानी वैसा ही करने लगी. तीन गुरुवार बीतते ही रानी राजा की समस्त संपत्ति नष्ट हो गई. यहां तक कि भोजन के भी लाले पड़ गए. घर की ऐसी स्थिति देख राजा दूर देश कमाने चला गया और घर में रानी अकेले रह गई.

रानी ने एक दिन अपनी बहन के पास अपनी दासी को भेजा और कहा कि वहां से कुछ मांग ला, जिससे घर का काम चल सके. उस दिन गुरुवार था और रानी की बहन बृहस्पति व्रत कथा सुन रही थी. रानी की दासी वहां पहुंचकर और रानी की सारी व्यथा सुनाई. लेकिन रानी की बहन ने कोई जवाब नहीं दिया. ऐसा देखकर रानी की दासी वहां रुके बिना ही वापस चली आई. दासी ने रानी को सारी बात बताई और कहा कि आपकी बहन ने किसी प्रकार की मदद नहीं की.

उधन रानी की बहन कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके अपनी बहन के घर आई और कहने लगी- बहन, मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी. तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली. कहो दासी क्यों गई थी.रानी ने अपनी सारी व्यथा सुनाई. रानी की बहन ने पूरी बात सुनने के बाद कहा कि देखो बहन, भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं. देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो.पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया. यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई.

दासी रानी से कहने लगी- हे रानी, जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें. तब रानी ने अपनी बहन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा.उसकी बहन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें. इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं.

व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहन अपने घर को लौट गई.सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा. घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं. फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया. अब पीला भोजन कहां से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुखी थे. उन्होंने व्रत रखा था इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे. इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए. भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया.उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी.

बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी. तब दासी बोली- देखो रानी, तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है.रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिए, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पित्र प्रसन्न होंगे. दासी की बात मानकर रानी अपना धन शुभ कार्यों में खर्च करने लगी, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा.

वीरवार व्रत की आरती/ बृहस्पति देव आरती:

ॐ जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा।छिन-छिन भोग लगाऊं, कदली फल मेवा।।ॐ जय बृहस्पति देवा।। तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अंतर्यामी।जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी।।ॐ जय बृहस्पति देवा।।

चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता।सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता।।ॐ जय बृहस्पति देवा।।तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े।प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े।।ॐ जय बृहस्पति देवा।।

दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी।पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी।।ॐ जय बृहस्पति देवा।।सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारो।विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी।।ॐ जय बृहस्पति देवा।।

जो कोई आरती तेरी प्रेम सहित गावे।जेष्टानंद बंद सो-सो निश्चय पावे।।ॐ जय बृहस्पति देवा।।

भगवान विष्णु की आरती:

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे।भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ॐ जय जगदीश हरे।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।स्वामी दुःख विनसे मन का।सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ॐ जय जगदीश हरे।

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥ॐ जय जगदीश हरे।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।स्वामी तुम अन्तर्यामी।पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥ॐ जय जगदीश हरे।

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता।स्वामी तुम पालन-कर्ता।मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ॐ जय जगदीश हरे।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।स्वामी सबके प्राणपति।किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥ॐ जय जगदीश हरे।

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।स्वामी तुम ठाकुर मेरे।अपने हाथ उठा‌ओ, द्वार पड़ा तेरे॥ॐ जय जगदीश हरे।

विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा।स्वमी पाप हरो देवा।श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, सन्तन की सेवा॥ॐ जय जगदीश हरे।

श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे।स्वामी जो कोई नर गावे।कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे॥ॐ जय जगदीश हरे।

वीरवार/ गुरुवार व्रत उद्यापन विधि: 

गुरुवार व्रत का उद्यापन करने के लिए एक दिन पहले 5 चीजें लाकर रख लीजिये- चने की दाल, गुड़, हल्दी, केले, पपीता और पीला कपड़ा. फिर गुरुवार को हर व्रत की तरह यथावत पूजा करिए उसके बाद भगवान से प्रार्थना करिए की आपने अपने व्रत पूरे कर लिए हैं और भगवान आप पर कृपा बनाये रखें, और आज आप इस व्रत का उद्यापन करने जा रहे हैं. पूजा में सारी सामग्री भगवान विष्णु को चढ़ाकर किसी ब्राह्मण को दान करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करें.

वीरवार/ गुरुवार व्रत के दौरान कुछ बातों का ख्याल रखना चाहिए:

अगर आप गुरुवार का व्रत शुरू कर रहे हैं तो इन बातों का जरूर ख्याल रखें…

1. यह ध्यान रखना चाहिए कि इस दिन बाल न कटाएं और ना ही दाढ़ी बनवाएं.

2. कपड़े और बाल न धोएं. साथ ही घर को धोए या पोछे नहीं. घर से कबाड़ बाहर निकालना भी इस दिन वर्जित माना जाता है.

3. नमक का प्रयोग न करें.

Check Also

इस तारीख को लगेगा साल का आखिरी सूर्य ग्रहण, भूल कर भी न करें यह कार्य

नई दिल्ली।  बीते 30 नवंबर को चंद्र ग्रहण बीतने के बाद अब इस साल का ...